بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
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कुरान की वह महान आयत जिसमें अल्लाह ने अपने प्यारे नबी ﷺ को “रऊफ़” और “रहीम” कहा
कुरान मजीद में अल्लाह तआला ने अनेक स्थानों पर अपने अंतिम पैगंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ के महान चरित्र, उच्च स्थान और उनकी रहमत का वर्णन किया है। उन्हीं में से एक ऐसी अत्यंत प्रभावशाली आयत सूरह अत-तौबा (9:128) है, जिसमें अल्लाह तआला स्वयं अपने प्रिय रसूल ﷺ के ऐसे गुणों का उल्लेख करते हैं जो हर मोमिन के दिल में उनके प्रति प्रेम और सम्मान को और अधिक बढ़ा देते हैं।
वह मुबारक आयत
لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِّنْ أَنفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُم بِالْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ
अर्थ:
“निश्चय ही तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक महान रसूल आए हैं। तुम्हारी तकलीफ़ उन्हें बहुत भारी लगती है। वे तुम्हारी भलाई के अत्यंत इच्छुक हैं और ईमान वालों के प्रति बहुत ही दयालु (रऊफ़) तथा अत्यंत रहम करने वाले (रहीम) हैं।”
(सूरह अत-तौबा : 128)
“रऊफ़” और “रहीम” का क्या अर्थ है?
इस आयत में अल्लाह तआला ने अपने प्यारे नबी ﷺ के लिए दो अत्यंत सुंदर गुणों का उल्लेख किया है।
रऊफ़ (رَءُوفٌ) का अर्थ है अत्यंत कोमल हृदय, बहुत अधिक दयालु और लोगों की पीड़ा को महसूस करने वाले।
रहीम (رَّحِيمٌ) का अर्थ है अत्यधिक रहम करने वाले, कृपालु और अपनी उम्मत की भलाई चाहने वाले।
यही कारण है कि नबी करीम ﷺ हमेशा अपनी उम्मत की हिदायत, सफलता और आखिरत की नजात की चिंता करते रहे। उनकी पूरी ज़िंदगी इंसानियत की भलाई और लोगों को अल्लाह की ओर बुलाने में गुज़री।
इस आयत में नबी ﷺ की महान शान
इस आयत में अल्लाह तआला ने स्वयं गवाही दी है कि उनके रसूल ﷺ अपनी उम्मत की तकलीफ़ों से दुखी होते हैं। वे लोगों के लिए आसानी चाहते हैं, कठिनाई नहीं। वे हर मोमिन के लिए रहमत, करुणा और भलाई का स्रोत हैं।
जब स्वयं अल्लाह अपने रसूल ﷺ की इन विशेषताओं का वर्णन करें, तो इससे बढ़कर उनकी महानता का प्रमाण और क्या हो सकता है?
हमें इस आयत से क्या सीख मिलती है?
यह आयत हमें सिखाती है कि नबी ﷺ से सच्ची मुहब्बत केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनके बताए हुए मार्ग पर चलने से सिद्ध होती है। जो व्यक्ति उनकी सुन्नत को अपनाता है, लोगों पर दया करता है, भलाई फैलाता है और अल्लाह की आज्ञा का पालन करता है, वही इस आयत के संदेश को अपने जीवन में उतारता है।
निष्कर्ष
सूरह अत-तौबा की आयत 128 केवल एक आयत नहीं, बल्कि नबी करीम ﷺ की अपनी उम्मत के प्रति अथाह प्रेम, करुणा और रहमत का जीवंत प्रमाण है। हर मुसलमान को चाहिए कि वह इस आयत को समझे, इसके संदेश पर विचार करे, कुरान से अपना संबंध मजबूत बनाए और अपने प्यारे नबी ﷺ की सुन्नत पर चलने का प्रयास करे। यही इस आयत का वास्तविक संदेश है।
